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“‘हे परमपावन, आप हमारे भीतर आशा हैं, जैसे हम आपके भीतर प्रकाश हैं। हम धन्य हों, क्योंकि हम आपका नाम हैं। हमारे भीतर अपने साम्राज्य के प्रति सचेत रहें। आपकी इच्छा पूर्ण हो, क्योंकि वह हमारी भी इच्छा है, आपके भारी और सुप्त लोकों से लेकर उन लोकों तक, जो आपके पंखों से फड़फड़ाते हैं। हमारा शरीर ऐसी वेदी बने, जहाँ आपके लिए मकई की अग्नि-आहुति दी जाए और वही हमारा पोषाहार बने। हमें दूसरों में अपने ऋण क्षमा करने योग्य बनाएँ, और इस तरह उनमें हम आपके ललाट को स्पर्श कर सकें।और हमें यह मानने की बुराई से मुक्त करें कि हम आपसे अलग हैं, क्योंकि पृथ्वी पर हम आपके प्रतिबिंबो हैं, जैसे स्वर्ग में आप हमारे प्रतिबिंब हैं।’ सदा जानो कि जो कुछ भी तुम्हें दिखाई देता है, वह तुम्हारी आंतरिक दशा का ही प्रतिबिंब है। उन अज्ञानियों जैसे मत बनो, जो अपने पड़ोसियों को सुधारकर संसार सुधारना चाहते हैं। सबसे पहले अपने हृदय को सुधारो, फिर दूसरों को सुधारने जाओ, और मैं कहता हूँ, उस दिन छोटे पक्षीओ भी तुम्हें सुनने के लिए पीछे-पीछे आएँगे।यदि एकजुट होना हो, तो अपने हृदय से होओ, पर कभी संगठन मत बनो; क्योंकि संगठनो अपने साथ अपनी बहनों, नियमों को लाते हैं, और कुछ और नियम अपने भाइयों, कर्मकांडों को लाते हैं, वे सब मिलकर सत्य के उस मूल सिद्धांत को नष्ट कर देंगे, जिससे वे जन्मे थे। इसलिए समूह भीतर से बाहर की ओर बनें, कभी बाहर से भीतर की ओर नहीं। क्योंकि पहला मार्ग तुम्हें विकास की ओर खोलता है, जबकि दूसरा तुम्हारी प्रगति के पंख काट देता है और समय के साथ तुम्हारी आत्माओं के लिए उपवन से अधिक कारागार बन जाता है। सबके प्रति खुल जाओ, और साथ ही, और जो तुम्हारी ही तरह स्वयं को खोलेंगे, वे तुम्हारे जागरूक भाई होंगे।ये बातें साकार नहीं होंगी, क्योंकि आपने पढ़ा है, या मन में बैठा लेने से साकार नहीं होंगी, बल्कि तभी होंगी, जब तुम इन्हें अपने हृदय की हर धड़कन में अनुभव करोगे और अपनी भक्ति व त्याग से इस पृथ्वी पर अंकित करोगे। सच कहता हूँ मैं, अपने शरीर पर विजय पाए बिना कोई भी इस संसार की पाठशाला से बाहर नहीं निकलेगा, न इसमें एक स्तर भी ऊपर उठेगा। इसलिए सतर्क रहो, क्योंकि परीक्षा का समय निकट है, और अनाज समेटने का अभियान आरंभ हो चुका है।धन-दौलत की बुराई के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है; फिर भी, मैं तुमसे कहता हूँ, ‘वह अपने आप में न अच्छी है, न बुरी; मनुष्य उसका जैसा उपयोग करता है, वह वैसी ही बुरी या अच्छी बन जाती है। सदा याद रखो कि तुम्हें जो कुछ दिया गया है, वह केवल तुम्हारे लिए नहीं, बल्कि इसलिए है कि तुम उसके संवाहको बनो और उसे उन भाइयों तक पहुँचाओ, जिन्हें उसकी अधिक आवश्यकता है। उनके अंदर अपने को ही सहायता करो। उनमें स्वयं को अर्पित करो और उन्हीं में अपनी पूर्णता पाओ।’जब भी तुम ऐसा करोगे, संसार के स्वामी तुम्हें माध्यम बनाकर जीवंत जल पूरी पृथ्वी तक पहुँचाएँगे। जब भी तुम ये चिजें करोगे, आत्मा की आँखें खुल जाएँगी, और तुम देखोगे कि तुम अकेले नहीं हो, न कभी थे; क्योंकि अनेक ज्येष्ठ भ्राताओं तुम्हारी देखभाल कर रहे हैं और तुम्हारे हृदयों को तैयार कर रहे हैं, ताकि उनके परिश्रम से, वे पवित्र नाम के सभी लोकों तक फैल सकें।इसलिए जिन्हें तुम अपने से बाहर देखते हो, उनके लिए जो कुछ कर सकते हो, करो; क्योंकि वास्तव में वे तुम्हीं हो। अब मेरे साथ जुड़ो और मौन रहकर अपने हृदय से कहो: सभी प्राणियों को शांति और प्रेम मिले। मैं संसार का प्रकाश हूँ। मेरे पास आओ।”











